ब्लॉगिंग: ऑनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति

(कादम्बिनी के अक्तूबर 07 अंक में प्रकाशित लेख का मूल, पूर्ण आलेख)

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

(ब्लॉगिंग के बारे में विभिन्न प्रकाशनों में लिखी जाने वाली मेरी श्रृंखला की यह पहली कड़ी है। अगली कड़ियों में ब्लॉगिंग से जुड़े  कुछ अन्य पहलुओं, अन्य परियोजनाओं और ब्लॉग जगत के अन्य चेहरों पर चर्चा करेंगे  - लेखक)

"दूसरे धर्मों का तो पता नहीं पर मैंने अपने धर्म में इतने दंभी, स्वार्थी और बेवकूफ लोग देखे हैं कि मुझे पछतावा है कि मैं क्यों जैन पैदा हुआ? अब जैन में तो हर चीज करने में पाप लगता है.... कुछ जैन संप्रदाय मूर्ति पूजा करते हैं तो कुछ मूर्तिपूजा के खिलाफ हैं। अब एक जैन मंदिर में जाकर लाइट चालू करके, माइक पे वंदना करके यह संतोष व्यक्त करते हैं कि मुझे स्वर्ग मिलेगा तो कुछ 'स्थानकवासी' जैन मानते हैं कि बिजली चालू करने से पाप लगता है और मूर्ति बनाने से बहुत छोटे जीव मरते हैं इसलिए पाप लगता है। यहां दोनों संप्रदाय एक ही भगवान की पूजा करेंगे लेकिन अलग ढंग से। फिर आठ दिन भूखे रहकर यह मान लेंगे कि उनका पाप मिट गया। यानी आपने तीन खून किए हों या लाखों लोगों के रुपए लूटे हों फिर भी कुछ दिन भूखे रहने से पाप मिट जाएंगे।" (तत्वज्ञानी के हथौड़े)।

"मैं अपने आपको मुसलमान नहीं मानता मगर मैं अपने मां-बाप की बहुत इज्जत करता हूं, सिर्फ और सिर्फ उनको खुश करने के लिए उनके सामने मुसलमान होने का नाटक करता हूं, वरना मुझे अपने आपको मुसलमान करते हुए बहुत गुस्सा आता है। मैं एक आम इन्सान हूं, मेरे दिल में वही है जो दूसरों में है। मैं झूठ, फरेब, मानदारी, बेईमानी, अच्छी और बुरी आदतें, कभी शरीफ और कभी कमीना बन जाता हूं, कभी किसी की मदद करता हूं और कभी नहीं- ये बातें हर इंसान में कॉमन हैं। एक दिन अब्बा ने अम्मी से गुस्से में आकर पूछा- क्या यह हमारा ही बच्चा है? तो वो हमारी तरह मुसलमान क्यों नहीं? कयामत के दिन अल्लाह मुझसे पूछेगा कि तेरे एक बेटे को मुसलमान क्यों नहीं बनाया तो मैं क्या जवाब दूं? पहले तो अब्बा-अम्मी ने मुझे प्यार से मनाया, फिर खूब मारा-पीटा कि हमारी तरह पक्का मुसलमान बने... यहां दुबई में दुनिया भर के देशों के लोग रहते हैं और ज्यादातर मुसलमान। मुझे शुरू से मुसलमान बनना पसंद नहीं और यहां आकर सभी लोगों को करीब से देखने और उनके साथ रहने के बाद तो अब इस्लाम से और बेजारी होने लगी है। मैं यह हरगिज नहीं कहता कि इस्लाम गलत है, इस्लाम तो अपनी जगह ठीक है। मैं मुसलमानों और उनके विचारों की बात कर रहा हूं।" (नई बातें, नई सोच)।

ये दोनों टिप्पणियां दो अलग-अलग लोगों ने लिखी हैं। दो ऐसे साहसिक युवकों ने, जो प्रगतिशीलता का आवरण ओढ़े किंतु भीतर से रूढ़िवादिता

ब्लॉगिंग है एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी। ऐसा माध्यम जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को।

को हृदयंगम कर परंपराओं और मान्यताओं को बिना शर्त ढोते रहने वाले हमारे समाज की संकीर्णताओं के भीतर घुटन महसूस करते हैं। क्या इस तरह की बेखौफ, निश्छलतापूर्ण और ईमानदार टिप्पणियां किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित की जा सकती हैं? क्या क्रुद्ध समाजों की उग्रतम प्रतिक्रियाओं से भरे इस दौर में ऐसे प्रतिरोधी स्वर किसी दूरदर्शन या आकाशवाणी से प्रसारित हो सकते हैं? क्या कोई धार्मिक, सामाजिक या राजनैतिक मंच इस ईमानदार किंतु विद्रोही आक्रोश की अभिव्यक्ति का मंच बन सकता है? ऐसा संभवत: सिर्फ एक मंच है जिसमें अभिव्यक्ति किन्हीं सीमाओं, वर्जनाओं, आचार संहिताओं या अनुशासन में कैद नहीं है। वह मंच है इंटरनेट पर तेजी से लोकप्रिय हो रही ब्लॉगिंग का।

औपचारिकता के तौर पर दोहरा दूं कि ब्लॉगिंग शब्द अंग्रेजी के 'वेब लॉग' (इंटरनेट आधारित टिप्पणियां) से बना है, जिसका तात्पर्य ऐसी डायरी से है जो किसी नोटबुक में नहीं बल्कि इंटरनेट पर रखी जाती है। पारंपरिक डायरी के विपरीत वेब आधारित ये डायरियां (ब्लॉग) सिर्फ अपने तक सीमित रखने के लिए नहीं हैं बल्कि सार्वजनिक पठन-पाठन के लिए उपलब्ध हैं। चूंकि आपकी इस डायरी को विश्व भर में कोई भी पढ़ सकता है इसलिए यह आपको अपने विचारों, अनुभवों या रचनात्मकता को दूसरों तक पहुंचाने का जरिया प्रदान करती है और सबकी सामूहिक डायरियों (ब्लॉगमंडल) को मिलाकर देखें तो यह निर्विवाद रूप से विश्व का सबसे बड़ा जनसंचार तंत्र बन चुका है। उसने कहीं पत्रिका का रूप ले लिया है, कहीं अखबार का, कहीं पोर्टल का तो कहीं ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा के मंच का। उसकी विषय वस्तु की भी कोई सीमा नहीं। कहीं संगीत उपलब्ध है, कहीं कार्टून, कहीं चित्र तो कहीं वीडियो। कहीं पर लोग मिल-जुलकर पुस्तकें लिख रहे हैं तो कहीं तकनीकी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। ब्लॉग मंडल का उपयोग कहीं भाषाएं सिखाने के लिए हो रहा है तो कहीं अमर साहित्य को ऑनलाइन पाठकों को उपलब्ध कराने में। इंटरनेट पर मौजूद अनंत ज्ञानकोष में ब्लॉग के जरिए थोड़ा-थोड़ा व्यक्तिगत योगदान देने की लाजवाब कोशिश हो रही है।

सीमाओं से मुक्त अभिव्यक्ति

ब्लॉगिंग है एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी। ऐसा माध्यम जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को। इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रियाओं का इंतजार करने की जरूरत। त्वरित अभिव्यक्ति, त्वरित प्रसारण, त्वरित प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी प्रसार के चलते ब्लॉगिंग अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गई है। ब्लॉगों की दुनिया पर केंद्रित कंपनी 'टेक्नोरैटी' की ताजा रिपोर्ट (जुलाई २००७) के अनुसार ९.३८ करोड़ ब्लॉगों का ब्यौरा तो उसी के पास उपलब्ध है। ऐसे ब्लॉगों की संख्या भी अच्छी खासी है जो 'टेक्नोरैटी' में पंजीकृत नहीं हैं। समूचे ब्लॉगमंडल का आकार हर छह महीने में दोगुना हो जाता है। सोचिए आज जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, तब अभिव्यक्ति और संचार के इस माध्यम का आकार कितना बड़ा होगा?

आइए फिर से अभिव्यक्ति के मुद्दे पर लौटें, जहां से हमने बात शुरू की थी। हालांकि ब्लॉगिंग की ओर आकर्षित होने के और भी कई कारण हैं

जो चाहें, लिखें और अगर चाहते हैं कि इसे दूसरे लोग भी पढ़ें तो ब्लॉग पर डाल दें। किसी को जँचेगा तो पढ़ लेगा वरना आगे बढ़ जाएगा। ब्लॉगिंग वस्तुत: एक लोकतांत्रिक माध्यम है। यहां कोई न लिखने के लिए मजबूर है, न पढ़ने के लिए।

लेकिन अधिकांश विशुद्ध, गैर-व्यावसायिक ब्लॉगरों ने अपने विचारों और रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए ही इस मंच को अपनाया। जिन करोड़ों लोगों के पास आज अपने ब्लॉग हैं, उनमें से कितने पारंपरिक जनसंचार माध्यमों में स्थान पा सकते थे? स्थान की सीमा, रचनाओं के स्तर, मौलिकता, रचनात्मकता, महत्व, सामयिकता आदि कितने ही अनुशासनों में निबद्ध जनसंचार माध्यमों से हर व्यक्ति के विचारों को स्थान देने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लेकिन ब्लॉगिंग की दुनिया पूरी तरह स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और मनमौजी किस्म की रचनात्मक दुनिया है। वहां आपकी 'भई आज कुछ नहीं लिखेंगे' नामक छोटी सी टिप्पणी का भी उतना ही स्वागत है जितना कि जीतेन्द्र चौधरी की ओर से वर्डप्रेस पर डाली गई सम्पूर्ण रामचरित मानस का। 'भड़ास' नामक सामूहिक ब्लॉग के सूत्र वाक्य से यह बात स्पष्ट हो जाती है- कोई बात गले में अटक गई हो तो उगल दीजिए... मन हल्का हो जाएगा..।

चौपटस्वामी नामक ब्लॉगर की लिखी यह टिप्पणी पढ़िए- "(हमारे यहां) धनिया में लीद मिलाने और कालीमिर्च में पपीते के बीज मिलाने को सामाजिक अनुमोदन है। रिश्वत लेना और देना सामान्य और स्वीकृत परंपरा है और उसे लगभग रीति-रिवाज के रूप में मान्यता प्राप्त है। कन्या-भ्रूण की हत्या यहां रोजमर्रा का कर्म है और अपने से कमजोर को लतियाना अघोषित धर्म है। गणेशजी को दूध पिलाना हमारी धार्मिक आस्था है। हमारा लड़का हमें गरियाते और जुतियाते हुए भी श्रवणकुमार है, पर पड़ोसी का ठीक-ठाक सा लड़का भी बिलावजह दुष्ट और बदकार है।"  यानी कि सौ फीसदी अभिव्यक्ति की एक सौ एक फीसदी आजादी!

वरिष्ठ ब्लॉगर अनूप शुक्ला (फुरसतिया) कहते हैं- "अभिव्यक्ति की बेचैनी ब्लॉगिंग का प्राण तत्व है और तात्कालिकता इसकी मूल प्रवृत्ति है। विचारों की सहज अभिव्यक्ति ही ब्लॉग की ताकत है, यही इसकी कमजोरी भी। यही इसकी सामर्थ्य है, यही इसकी सीमा भी। सहजता जहां खत्म हुई वहां फिर अभिव्यक्ति ब्लॉगिंग से दूर होती जाएगी।"

जो चाहें, लिखें और अगर चाहते हैं कि इसे दूसरे लोग भी पढ़ें तो ब्लॉग पर डाल दें। किसी को जंचेगा तो पढ़ लेगा वरना आगे बढ़ जाएगा। ब्लॉगिंग वस्तुत: एक लोकतांत्रिक माध्यम है। यहां कोई न लिखने के लिए मजबूर है, न पढ़ने के लिए। जो अच्छा लिखते हैं, उनके ठिकानों पर स्वत: भीड़ हो जाती है, उनके ब्लॉगों में टिप्पणियों की बहार आ जाती है। ऐसे कई ब्लॉग हीरो ब्लॉगिंग की दुनिया ने दिए हैं जो सिर्फ अपने लेखों, भाषा या रचनात्मकता के लिए ही नहीं, तकनीकी मार्गदर्शन देने (गैर-अंग्रेजी ब्लॉगरों को इसकी जरूरत पड़ती ही है) और नए ब्लॉगरों व ब्लॉग परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने के लिए भी जाने जाते हैं।

ब्लॉग विश्व के चर्चित लोग

दुनिया के विख्यात ब्लॉगरों में एंड्र्यू सलीवान (एंड्र्यूसलीवान.कॉम), रॉन गंजबर्गर (पोलिटिक्स१.कॉम), ग्लेन रोनाल्ड (इन्स्टापंडित.कॉम), डंकन ब्लैक, पीटर रोजास, जेनी जार्डिन, बेन ट्रोट, जोनाथन श्वार्ट्ज, जेसन गोल्डमैन, रॉबर्ट स्कोबल, मैट ड्रज (ड्रजरिपोर्ट.कॉम) आदि शामिल हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को महाभियोग की हद तक ले जाने वाले मोनिका लुइन्स्की प्रकरण का पर्दाफाश मैट ड्रज ने ही अपने ब्लॉग पर किया था। चीनी अभिनेत्री जू जिंगले का ब्लॉग संभवत: दुनिया का सर्वाधिक लोकप्रिय ब्लॉग है जिसे पांच करोड़ से भी अधिक बार पढ़ा जा चुका है। ब्लॉगिंग का चस्का बहुत सी विख्यात हस्तियों को भी लगा है जिनमें टेनिस सुंदरी अन्ना कोर्निकोवा, हॉलीवुड अभिनेत्री पामेला एंडरसन, गायिका ब्रिटनी स्पीयर्स, अभिनेत्री व सुपरमॉडल कर्टनी लव, फिल्म निर्देशक व अभिनेता केविन स्मिथ आदि शामिल हैं। हमारे देश में

भारत के कई अंग्रेजी ब्लॉग काफी लोकप्रिय हो गए हैं जिनमें गौरव सबनीस का वान्टेड प्वाइंट, अमित वर्मा का इंडिया अनकट, रश्मि बंसल का यूथ सिटी, अमित अग्रवाल का डिजिटल इनिस्परेशन, दीना मेहता का दीनामेहता.कॉम आदि प्रमुख हैं।

फिल्म अभिनेता आमिर खान (लगानडीवीडी.कॉम), जॉन अब्राहम, बिपासा बसु (बिपासाबसुनेट.कॉम), राहुल बोस, राहुल खन्ना, शेखर कपूर, सुचित्रा कृष्णमूर्ति, अनुपम खेर, कवि अशोक चक्रधर, रेडिफ चेयरमैन अजीत बालाकृष्णन, इंडियावर्ल्ड.कॉम बनाकर उसे छह सौ करोड़ रुपए में सिफी.कॉम को बेचने वाले राजेश जैन, वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई , नौकरी.कॉम के सी ई ओ संजीव बीखचंदानी आदि भी सक्रिय ब्लॉगर हैं। आमिर खान के ब्लॉग पर तो पिछली पोस्ट के जवाब में सत्रह सौ पाठकों की टिप्पणियां दर्ज हैं!

भारत के कई अंग्रेजी ब्लॉग काफी लोकप्रिय हो गए हैं जिनमें गौरव सबनीस का वान्टेड प्वाइंट, अमित वर्मा का इंडिया अनकट, रश्मि बंसल का यूथ सिटी, अमित अग्रवाल का डिजिटल इनिस्परेशन, दीना मेहता का दीनामेहता.कॉम आदि प्रमुख हैं। आई आई टी के छात्र रहे अमित अग्रवाल तो आई.बी.एम. में अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर पूरी तरह अपने ब्लॉग पर ही केंद्रित हो गए हैं और कहा जा रहा है कि नौकरी की तुलना में ब्लॉग से उनकी कमाई कहीं ज्यादा है। संदर्भ आया है तो बता दें कि ब्लॉगों पर मुख्यत: विज्ञापनों और प्रायोजित लेखों के माध्यम से कमाई होती है। दुनिया में ब्लॉगिंग से सर्वाधिक कमाई करने वालों में केविन रोस नामक किशोर प्रमुख हैं जिसने महज डेढ़ साल की अवधि में छह करोड़ डालर (लगभग २५ करोड़ रुपए) की राशि अर्जित की है। ब्लॉगर पाउला नील मूनी ने सर्वाधिक आय अर्जित करने वाले ब्लॉग-उद्यमियों की जो सूची बनाई है उसमें मारकस फ्राइंड़ (३.६ करोड़ डालर), वेबलॉग्स के जेसन कैलाकैनिस (१.१ करोड़ डालर), रोजेलिन गार्डनर (४३ लाख डालर) आदि प्रमुख हैं। गूगल के एड-सेंस कार्यक्रम और कई अन्य कंपनियों की विज्ञापन योजनाओं के तहत सैकड़ों ब्लॉगर अच्छी खासी रकम बना रहे हैं। यह बात अलग है कि अभी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में ब्लॉगरों को इस किस्म की कमाई नहीं हो रही। रवि रतलामी का हिंदी ब्लॉग, रचनाकार और टेक ट्रबल आदि ब्लॉगों का संचालन करने वाले रवि रतलामी को भी कुछ हजार की आय होने लगी है। उनका कहना है- "पिछले वर्ष मैंने व्यावसायिक चिट्ठाकारी में प्रवेश किया था। साल भर के भीतर मुझे जो धनराशि मिली है, उसका कोई तीस प्रतिशत हिंदी ब्लॉगों से मिल रहा है। मेरे विचार में हिंदी में भी संभावनाएं खूब हैं। हां, इसमें थोड़ा समय जरूर लग सकता है।"

अगर आपने झटपट ब्लॉग बनाकर फटाफट धन कमाने की योजना बना ली हो तो जान लीजिए कि यह कोई आसान काम नहीं है। अपने ब्लॉग

हिंदी ब्लॉगिंग के प्रमुख हस्ताक्षरों में जीतेन्द्र चौधरी, अनूप शुक्ला, आलोक कुमार,  देवाशीष, रवि रतलामी, पंकज बेंगानी, समीर लाल, रमण कौल, जगदीश भाटिया, मसिजीवी, पंकज नरूला, प्रत्यक्षा, अविनाश, अनुनाद सिंह, शशि सिंह, सृजन शिल्पी,  ई-स्वामी, सुनील दीपक, संजय बेंगानी, जयप्रकाश मानस, नीरज दीवान  आदि के नाम लिए जा सकते हैं।

के लिए अमित अग्रवाल ही रोजाना सैंकड़ों ब्लॉगों, उतनी ही आरएसएस फीड (ब्लॉगों के लेखों को अपेक्षाकृत आसान फॉरमेट में कंप्यूटर या इंटरनेट ब्राउजर पर पढ़ने की सुविधा) और दर्जनों वेबसाइटों का अध्ययन करते हैं। रोजाना बारह से चौदह घंटे तक काम करना, पचासों मेल संदेशों का जवाब देना और सर्च इंजनों को खंगालना उनके दैनिक कर्म में शामिल है। लेकिन फिर भी, कोशिश करने में कोई बुराई नहीं है।

हिंदी ब्लॉगिंग के प्रमुख हस्ताक्षरों में जीतेन्द्र चौधरी, अनूप शुक्ला, आलोक कुमार (जिन्होंने पहला हिंदी ब्लॉग लिखा और उसके लिए 'चिट्ठा' शब्द का प्रयोग किया), देवाशीष, रवि रतलामी, पंकज बेंगानी, समीर लाल, रमण कौल, मैथिलीजी, जगदीश भाटिया, मसिजीवी, पंकज नरूला, प्रत्यक्षा, अविनाश, अनुनाद सिंह, शशि सिंह, सृजन शिल्पी, ई-स्वामी, सुनील दीपक, संजय बेंगानी  आदि के नाम लिए जा सकते हैं।  जयप्रकाश मानस, नीरज दीवान, श्रीश बेंजवाल शर्मा, अनूप भार्गव, शास्त्री जेसी फिलिप, हरिराम, आलोक पुराणिक, ज्ञानदत्त पांडे, रवीश कुमार, अभय तिवारी, नीलिमा, अनामदास, काकेश, अतुल अरोड़ा, घुघुती बासुती, संजय तिवारी, सुरेश चिपलूनकर, तरुण जोशी, अफलातून जैसे अन्य उत्साही लोग भी ब्लॉग जगत पर पूरी गंभीरता और नियम के साथ सक्रिय हैं और इंटरनेट पर हिंदी विषय वस्तु को समृद्ध बनाने में लगे हैं। अगर आप ब्लॉगों की दुनिया से अनजान हैं, तो संभवत: ये नाम भी आपने नहीं सुने होंगे। लेकिन अगर आप ब्लॉगजगत में सावन की तेज हवा में उड़ती पतंग का सा फर्राटा भी मार लें तो इन सबकी अनूठी रचनात्मकता, हिंदी प्रेम और ब्लॉगी जुनून का लोहा मानने पर मजबूर हो जाएंगे। इस लेख के शुरू में जिन दो ब्लॉगों पर लिखी टिप्पणियां उद्धृत की गई हैं, उन्हें रवि कामदार और शुएब संचालित करते हैं। प्रसंगवश, इसी ब्लॉगविश्व में मीडिया की आत्मालोचना पर केंद्रित 'वाह मीडिया'  नामक ब्लॉग के माध्यम से छोटी सी उपस्थिति मेरी भी है।

ब्लॉगिंग में है कुछ अलग बात!

अंग्रेजी में तो ब्लॉगिंग की उम्र दस वर्ष हो गई है। इन दस वर्षों में संचार और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनने के साथ-साथ उसने सामूहिकता और सामुदायिकता पर आधारित अनेकों नई विधाओं को जन्म दिया है। दुनिया का पहला ब्लॉग किसने बनाया, इस बारे में मतैक्य नहीं है। लेकिन इस बारे में कोई विवाद नहीं है कि ब्लॉगिंग की शुरूआत १९९७ में हुई । अप्रैल १९९७ में न्यूयॉर्क के डेव वाइनर ने स्क्रिप्टिंग न्यूज नामक एक वेबसाइट शुरू की जिसने ब्लॉगिंग की अवधारणा को स्पष्ट किया और लोगों को अपने विचार इंटरनेट पर प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया। दिसंबर १९९७ में जोर्न बार्गर ने रोबोटविसडम.कॉम की शुरूआत की और पहली बार इसे 'वेब लॉग' का नाम दिया। पीटरमी.कॉम के पीटर मरहोल्ज ने वेबलॉग के स्थान पर उसके छोटे रूप 'ब्लॉग' का प्रयोग किया। तब से इंटरनेट पर ब्लॉगों की जो तेज हवा बही, उसने पहले आंधी और अब तूफान का रूप ले लिया है।

हालांकि ब्लॉगिंग के आगमन के  पहले से ही अभिव्यक्ति के नि:शुल्क मंच इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। नब्बे के दशक के शुरू में ही जियोसिटीज.कॉम, ट्राइपोड.कॉम, ८के.कॉम, होमपेज.कॉम, एंजेलफायर.कॉम, गो.कॉम आदि ने आम लोगों को अपने निजी इंटरनेट होमपेज बनाने की सुविधा दी थी और इनमें से अधिकांश आज भी सक्रिय हैं। उन पर लाखों लोगों ने अपनी वेबसाइटें बनाई भी लेकिन उन्हें ब्लॉगिंग की तर्ज पर अकूत लोकप्रियता नहीं मिली क्योंकि वेबसाइट बनाने के लिए थोड़ा-बहुत तकनीकी ज्ञान आवश्यक है। दूसरी तरफ ब्लॉग का निर्माण और संचालन लगभग मेल पाने-भेजने जितना ही आसान है। ब्लॉगर, वर्डप्रेस, माईस्पेस, लाइवजर्नल, ब्लॉग.कॉम, टाइपपैड, पिटास, रेडियो यूजरलैंड आदि पर ब्लॉग बनाना और टिप्पणियां पोस्ट करना बहुत आसान है। सरल, तेज, विश्वव्यापी, विशाल, नि:शुल्क और इंटर-एक्टिव होने के साथ-साथ कोई संपादकीय, कानूनी या संस्थागत नियंत्रण न होना ब्लॉगिंग की बुनियादी शक्तियां (और कमजोरी भी) हैं जिन्होंने इसे इंटरनेट आधारित अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों की तुलना में अधिक लोकप्रिय बनाया है। ब्लॉगिंग विश्व ने उन लोगों की स्मृतियों को भी जीवित रखा है जो सरकारी दमनचक्र, समाजविरोधी तत्वों के जुल्म या फिर आतंकवादी कार्रवाइयों के शिकार हुए। चीन में भले ही थ्येनआनमन चौक पर हुई अमानवीय सैन्य कार्रवाई के खिलाफ मुंह खोलना बहुत बड़ा अपराध हो, पर ब्लॉगिंग की दुनिया में ऐसी रोकटोक नहीं। 'यान्स ग्लटर' नामक ब्लॉग का संचालन करने वाली यान शाम शैकलटन १९८९ में थ्येनआनमन चौक पर हुए सैनिक नरसंहार में मारे गए युवकों के प्रति अपनी भावनाओं को इस तरह व्यक्त करती हैं-

'मैं भूलूंगी नहीं। मैं आपको हमेशा याद रखने का वादा करती हूं। मैं ऐसा दोबारा नहीं होने दूंगी। मैं पूरी दुनिया को आपकी, थ्येनआनमन चौक के छात्रों की याद दिलाती रहूंगी। मेरे बड़े भाइयो और बहनों!'

दमन के विरुद्ध विद्रोह और लोकतंत्र की चाहत को भी ब्लॉगिंग ने स्वर दिए हैं। बहरीन में शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करते लोगों के सरकारी

ब्लॉग लेखन आम तौर पर बहुत गंभीर लेखन नहीं माना जाता लेकिन ड्रज रिपोर्ट, बगदाद ब्लॉगर आदि की जिम्मेदाराना भूमिकाओं और ट्रेन्ट लोट के इस्तीफे के बाद समाचार माध्यम के रूप में भी उसकी साख और विश्वसनीयता में वृद्धि हुई है।

दमन को वहीं के एक ब्लॉगर 'चनाद बहरीनी' (ब्लॉगर का छद्म नाम) ने अपने चित्रों में कैद किया और ब्लॉग के माध्यम से दुनिया भर को उसकी जानकारी दी। कुछ वर्ष पहले अमेरिकी सीनेटर ट्रेन्ट लोट ने १९४८ के राष्ट्रपति चुनाव में हैरी ट्रूमैन के प्रतिद्वंद्वी और रंगभेद समर्थक उम्मीदवार स्ट्रॉम थरमंड का समर्थन किया। मीडिया ने इस पर खास ध्यान नहीं दिया तो ब्लॉगर समुदाय ने जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया और सीनेटर से इस्तीफा दिलवाकर ही दम लिया। इस घटना में ब्लॉगरों ने मीडिया के वैकल्पिक स्वरूप के रूप में अपनी उपयोगिता सिद्ध की। यही बात इराक युद्ध के दौरान भी 'बगदाद ब्लॉगर' के नाम से प्रसिद्ध एक गुमनाम ब्लॉगर ने 'सलाम पैक्स' के नाम से लिखे अपने ब्लॉग के माध्यम से दिखाई। वह इराक युद्ध की विनाशलीला का आंखों देखा हाल उपलब्ध कराता रहा और उसकी टिप्पणियों का दुनिया भर के मीडिया ने उपयोग किया। ब्लॉगिंग को लोकप्रिय बनाने में उसकी अहम भूमिका मानी जाती है। इराक युद्ध के दौरान जब बीबीसी और वॉयस ऑफ अमेरिका में इस ब्लॉगर पर केंद्रित कार्यक्रमों का प्रसारण किया गया तो उसके पिता को पहली बार अहसास हुआ कि संभवत: ये कार्यक्रम मेरे शर्मीले पुत्र के बारे में हैं जो चुपचाप कमरे में बैठकर इंटरनेट पर कुछ करता रहता है। उन्हें लगा कि सद्दाम हुसैन की खुफिया एजेंसियों को पता चलने वाला है और वे पक्के तौर पर बहुत बड़े संकट में फंसने जा रहे हैं। लेकिन सौभाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ और सलाम का नाम ब्लॉगिंग के इतिहास में दर्ज हो गया। (संयोगवश, सलाम ने इराक युद्ध के बाद लंदन के 'गार्जियन' अखबार में कॉलम भी लिखा)।

ब्लॉग लेखन आम तौर पर बहुत गंभीर लेखन नहीं माना जाता लेकिन ड्रज रिपोर्ट, बगदाद ब्लॉगर आदि की जिम्मेदाराना भूमिकाओं और ट्रेन्ट लोट के इस्तीफे के बाद समाचार माध्यम के रूप में भी उसकी साख और विश्वसनीयता में वृद्धि हुई है। पिछले अप्रैल माह में अमेरिका के वर्जीनिया विश्वविद्यालय में अनजान हमलावरों ने अंधाधुंध फायरिंग कर कई छात्रों को मार डाला तब ब्लॉगर अनुराग मिश्रा ने हमारे अपने 'इंडिया टीवी' के लिए रिपोर्टिंग की। इंडिया टीवी से जुड़े नीरज दीवान, जो स्वयं 'कीबोर्ड के सिपाही' नामक ब्लॉग चलाते हैं, कहते हैं- "उस घटना पर किसी भारतीय द्वारा अमेरिका से दी जा रही वह पहली जानकारी थी। अनुराग भाषा, शैली में पूर्णत: सक्षम और विश्वस्त ब्लॉगर हैं। वे उसी विश्वविद्यालय के छात्र भी हैं। उस वक्त मेरे पास उनसे बेहतर कोई और विकल्प नहीं था। अनुराग ने जन-पत्रकार की भूमिका बखूबी निभाई ।"

हिंसा व आतंक के खिलाफ और लोकतंत्र के पक्ष में खड़े होने वाले ये गुमनाम सिपाही स्वयं भी लोकतंत्र विरोधियों के दमन का शिकार होते रहे हैं। ईरान सरकार ने अराश सिगारची नामक ब्लॉगर को उसकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति से खफा होकर १४ साल के लिए जेल में डाल दिया है। अनार्कएंजेल नामक एक ब्लॉगर के खिलाफ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने मौत का फतवा भी जारी किया है। सिंगापुर में दो चीनी ब्लॉगरों को स्थानीय कानूनों की आलोचना करने ओर मुसलमानों के खिलाफ टिप्पणियां करने के लिए जेल में डाल दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े एक राजनयिक को उसके ब्लॉग में लिखी टिप्पणियों के कारण सूडान ने तीन दिन में देश छोड़ने का आदेश दिया था। यानी चुनौतियों की कोई कमी भी नहीं।

नई दिशाएं, नए स्वरूप

बहरहाल, ब्लॉगिंग अब नए क्षेत्रों, नई दिशाओं में आगे बढ़ रही है। असल में ब्लॉग तो अपनी अभिव्यक्ति, अपनी रचनाओं को विश्वव्यापी इंटरनेट उपयोक्ताओं के साथ बांटने का मंच है, और ऐसे मंच का प्रयोग सिर्फ लेखों, राजनैतिक टिप्पणियों और साहित्यिक रचनाओं के लिए किया जाए, यह किसी किताब में नहीं लिखा है। ब्लॉग पर फोटो या वीडियो डाल दीजिए, वह फोटो ब्लॉग तथा वीडियो ब्लॉग कहलाएगा। संगीत डाल दीजिए तो वही म्यूजिक ब्लॉग हो जाएगा। रेडियो कार्यक्रम की तरह अपनी टिप्पणियों को रिकॉर्ड करके ऑडियो फाइलें डाल दीजिए तो वह पोडकास्ट कहलाएगा। किसी ब्लॉग को कई लोग मिलकर चलाएं तो वह कोलेबरेटिव या सामूहिक ब्लॉग बन जाएगा। हिंदी में 'बुनोकहानी' नामक ब्लॉग पर कई ब्लॉगर मिलकर कहानियां लिख रहे हैं। यह इसी श्रेणी में आएगी। किसी परियोजना विशेष से जुड़े लोग यदि आपस में विचारों के आदान-प्रदान के लिए ब्लॉग बनाएंगे तो वह प्रोजेक्ट ब्लॉग माना जाएगा और अगर कोई कंपनी अपने उत्पादों या सेवाओं का प्रचार करने या फिर अपने कर्मचारियों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान के लिए ब्लॉग बनाती है तो इसे कारपोरेट ब्लॉग कहेंगे। यानी ब्लॉग आपकी जरूरतों के अनुसार ढल सकता है। यूट्यूब (आम लोगों की ओर से पोस्ट किए गए वीडियो), फ्लिकर (आम लोगों के खींचे चित्र), विकीपीडिया (आम लोगों द्वारा लिखे गए लेख) जैसी परियोजनाएं भी ब्लॉगों की ही तर्ज पर विकसित हुई हैं। अब आम लोगों के भेजे समाचारों की वेबसाइटें भी लोकप्रिय हो रही हैं। अंग्रेजी समाचार चैनल आईबीएन ने पिछले साल इस दिशा में पहल की थी जो बहुत सफल हुई । भारत में मेरीन्यूज.कॉम भी नागरिक पत्रकारिता (सिटीजन जर्नलिज्म) पर आधारित एक चर्चित वेबसाइट है।

ब्लॉगिंग के और भी बहुत से रूप तथा उपयोग हैं। आजकल मेल पर जिस तरह से वायरसों और स्पैम (अनचाही तथा घातक डाक) का हमला हो रहा है उसे देखते हुए बहुत सी कंपनियां ब्लॉगों को संदेशों के आदान-प्रदान के सुरक्षित माध्यम के रूप में भी इस्तेमाल कर रही हैं। यह सामाजिक मेलजोल का भी एक माध्यम है। अपने ब्लॉग पर टिप्पणियां करने वाले अनजान व्यक्तियों के साथ संदेशों का आदान-प्रदान करते-करते उनके साथ मित्रता हो जाना स्वाभाविक है। धीरे-धीरे एक ही विषय में रुचि रखने वाले लोगों के बीच सामुदायिकता की भावना पैदा हो जाती है। ऐसे ब्लॉगर समय-समय पर मिल-बैठकर चर्चाएं भी करते हैं जैसे कि १४ जुलाई को दिल्ली में पहले कैफे कॉफी डे पर और फिर एक नए ब्लॉग एग्रीगेटर के दफ्तर पर हुई ।

शैशव काल में है हिंदी ब्लॉगिंग

हिंदी में अभी ब्लॉगिंग अपने शैशव काल में है। अंग्रेजी में जहां ब्लॉगिंग १९९७ में शुरू हो गई थी वहीं हिंदी में पहला ब्लॉग दो मार्च २००३ को लिखा गया। समय के लिहाज से अंग्रेजी और हिंदी के बीच महज छह साल की दूरी है लेकिन ब्लॉगों की संख्या के लिहाज से दोनों के बीच कई प्रकाश-वर्षों का अंतर है। अंग्रेजी

अंग्रेजी में जहां ब्लॉगिंग १९९७ में शुरू हो गई थी वहीं हिंदी में पहला ब्लॉग दो मार्च २००३ को लिखा गया। समय के लिहाज से अंग्रेजी और हिंदी के बीच महज छह साल की दूरी है लेकिन ब्लॉगों की संख्या के लिहाज से दोनों के बीच कई प्रकाश-वर्षों का अंतर है।

में और कुछ नहीं तो साढ़े तीन करोड़ ब्लॉग मौजूद हैं जबकि हिंदी में करीब एक हजार। हालांकि अप्रत्याशित रूप से ब्लॉगिंग विश्व में एशिया ने ही दबदबा बनाया हुआ है। टेक्नोरैटी के अनुसार विश्व के कुल ब्लॉगों में से ३७ प्रतिशत जापानी भाषा में हैं और ३६ प्रतिशत अंग्रेजी में। कोई आठ प्रतिशत ब्लॉगों के साथ चीनी भाषा तीसरे नंबर पर है। ब्लॉगों के मामले में हिंदी अपने ही देश की तमिल से भी पीछे है जिसमें दो हजार से अधिक ब्लॉग मौजूद हैं। लेकिन हिंदी ब्लॉग जगत निराश नहीं है। कुवैत में रहने वाले वरिष्ठ हिंदी ब्लॉगर जीतेन्द्र चौधरी कहते हैं- २००३ में शुरू हुए इस कारवां में बढ़ते हमसफरों की संख्या से मैं संतुष्ट हूं। आज हम लगभग ९०० ब्लॉगर हैं और साल के अंत तक हम लगभग ११०० का आंकड़ा छू सकते हैं।

जीतेंद्र चौधरी के आशावाद के विपरीत रवि रतलामी मौजूदा हालात से संतुष्ट नहीं दिखते, "जब तक हिंदी ब्लॉग लेखकों की संख्या एक लाख से ऊपर न पहुंच जाए और किसी लोकप्रिय चिट्ठे को नित्य दस हजार लोग नहीं पढ़ लें तब तक संतुष्टि नहीं आएगी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने की गति अत्यंत धीमी है। पर इंटरनेट और कंप्यूटर में हिंदी है भी तो बहुत जटिल भाषा- जिसमें तमाम दिक्कतें हैं।"

दुनिया की दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा होने के लिहाज से देखें तो हिंदी में ब्लॉगों की संख्या अपेक्षा से बहुत कम दिखेगी। लेकिन इसके कारण स्पष्ट हैं। टेलीफोन, कंप्यूटर, इंटरनेट, बिजली और तकनीकी ज्ञान जैसी बुनियादी आवश्यकताएं पूरी किए बिना कंप्यूटर और इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय बनाने की आशा नहीं की जा सकती। दूसरे, आर्थिक रूप से हम इतने सक्षम और निश्चिंत नहीं हैं कि ऐसी किसी तकनीकी सुविधा पर समय, श्रम और धन खर्च करना पसंद करें, जो अपरिहार्य नहीं है। तीसरे, हमारा समाज संभवत: पश्चिम के जितना अभिव्यक्तिमूलक भी नहीं है। बहरहाल, आर्थिक तरक्की के साथ-साथ इन सभी क्षेत्रों में स्थितियां बदल रही हैं जिसका असर ब्लॉग की दुनिया में भी दिख रहा है। पिछले छह महीने में नए हिंदी ब्लॉग बनने की गति कुछ तेज हुई है। चिट्ठाकार आलोक कहते हैं, "ब्लॉगिंग की गति में आई तेजी के कई कारण हैं। एक तो हिंदी में लेखन के अलग-अलग तंत्रों (सॉफ्टवेयरों) का विकास, दूसरे विन्डोज एक्सपी का अधिक प्रयोग जिसमें हिंदी में काम करना विंडोज ९८ की तुलना में अधिक आसान है, तीसरे ब्लॉगर जैसी वेबसाइटों में मौजूद सुविधाओं में वृद्धि (जिनसे ब्लॉगिंग की प्रक्रिया निरंतर आसान हो रही है), और चौथे पत्र-पत्रिकाओं में इंटरनेट, ब्लॉग आदि के बारे में छप रहे लेख।"

पुणे के सॉफ्टवेयर इंजीनियर देवाशीष चक्रवर्ती, जिन्होंने नवंबर २००३ में नुक्ताचीनी नामक ब्लॉग शुरू किया, ने हिंदी ब्लॉगिंग में अहम भूमिका निभाई है। नुक्ताचीनी के अलावा वे पॉडभारती नामक पोडकास्ट और नल प्वाइंटर नामक अंग्रेजी ब्लॉग चलाते हैं। उन्होंने श्रेष्ठ ब्लॉगों को पुरस्कृत करने के लिए 'इंडीब्लॉगीज' नामक पुरस्कारों की शुरूआत भी की है। देवाशीष कहते हैं, "भारतीय भाषाओं में ब्लॉग जगत में निरंतर विकास होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। अधिकांश भाषाओं के अपने ब्लॉग एग्रीगेटर हैं, और स्थानीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने भी भाषायी ब्लॉगरों को काफी प्रचारित एवं प्रोत्साहित किया है। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट की कुछ तकनीकों से भी भाषायी ब्लॉगिंग को गति मिली है।" इस बीच, तरकश समूह ने भी ब्लॉग पोर्टल के रूप में एक अच्छी शुरूआत की है और वह तरकश जोश (अंग्रेजी), टॉक एंड कैफे (अंग्रेजी) और पॉडकास्ट का संचालन कर रहा है। नारद के कुछ प्रतिद्वंद्वी ब्लॉग एग्रीगेटर भी सामने आए हैं जिनमें ब्लॉगवाणी, चिट्ठाजगत और हिंदीब्लॉग्स.कॉम प्रमुख हैं। इन सबने हिंदी ब्लॉग जगत को विविधता दी है और उसकी विषय वस्तु को समृद्ध किया है।

अक्षरग्राम और नारद

बहरहाल, अगर कुछ समर्पित ब्लॉगरों ने मिलकर प्रयास न किए होते तो शायद हिंदी में ब्लॉगिंग की हालत बहुत कमजोर होती। अलग-अलग

जीतेंद्र चौधरी का कहना है, "इंटरनेट पर हिंदी का प्रचार-प्रसार हिंदी ब्लॉगिंग के जरिए बढ़ सकता है क्योंकि हर ब्लॉगर अपने साथ कम से कम दस पाठक जरूर लाएगा। अगर उन दस पाठकों में से चार ने भी ब्लॉगिंग शुरू की तो एक श्रृंखला बन जाएगी और ध्यान रखिए, इंटरनेट पर जितनी ज्यादा सामग्री हिंदी में उपलब्ध होगी, जनमानस का इंटरनेट के प्रति रुझान भी बढ़ता जाएगा।

देशों में रहने ब्लॉगरों के कुछ समूहों ने हिंदी ब्लॉगिंग को संस्थागत रूप देने और नए ब्लॉगरों को प्रोत्साहित करने का अद्वितीय काम किया है। उन्होंने हिंदी में काम करने की दिशा में मौजूद तकनीकी गुत्थियां सुलझाने, नए लोगों को तकनीकी मदद देने, हिंदी टाइपिंग और ब्लॉगिंग के लिए सॉफ्टवेयरों का विकास करने, ब्लॉगों को अधिकतम लोगों तक पहुंचाने के लिए ब्लॉग एग्रीगेटरों (एक सॉफ्टवेयर जो विभिन्न ब्लॉगों पर दी जा रही सामग्री को एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने में सक्षम है) का निर्माण करने, सामूहिक रूप से अच्छी गुणवत्ता वाली रचनाओं का सृजन करने और ब्लॉगरों के बीच नियमित चर्चा के मंच बनाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। 'चिट्ठाकारों की चपल चौपाल' के नाम से चर्चित अक्षरग्राम नेटवर्क ऐसा ही एक समूह है। इसके सदस्यों में पंकज नरूला (अमेरिका), जीतेन्द्र चौधरी (कुवैत), ईस्वामी, संजय बेंगानी, अमित गुप्ता, पंकज बेंगानी, निशांत वर्मा, विनोद मिश्रा, अनूप शुक्ला और देवाशीष चक्रवर्ती शामिल हैं। यह समूह ब्लॉग एग्रीगेटर 'नारद' और 'चिट्ठा विश्व' (आजकल निष्क्रिय), 'अक्षरग्राम', हिंदी विकी 'सर्वज्ञ', ब्लॉगरों के बीच वैचारिक-आदान प्रदान के मंच 'परिचर्चा', सामूहिक रचनाकर्म पर आधारित परियोजना 'बुनो कहानी', ब्लॉग पत्रिका 'निरंतर' आदि का संचालन करता है। ब्लॉग जगत से जुड़े अधिकांश सदस्य इन सभी से न सिर्फ परिचित हैं, बल्कि किसी न किसी तरह जुड़े हुए भी हैं। (हिंदिनी, भड़ास, हिंद-युग्म, सराय, चिट्ठा चर्चा आदि भी सामूहिक ब्लॉगों के अच्छे उदाहरण हैं)।

हिंदी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में पिछले चार वर्षों के दौरान हुई धीमी प्रगति के बावजूद इस समूह ने अपनी लगन और उत्साह में कमी नहीं आने दी। इस बारे में जीतेंद्र चौधरी का कहना है, "इंटरनेट पर हिंदी का प्रचार-प्रसार हिंदी ब्लॉगिंग के जरिए बढ़ सकता है क्योंकि हर ब्लॉगर अपने साथ कम से कम दस पाठक जरूर लाएगा। अगर उन दस पाठकों में से चार ने भी ब्लॉगिंग शुरू की तो एक श्रृंखला बन जाएगी और ध्यान रखिए, इंटरनेट पर जितनी ज्यादा सामग्री हिंदी में उपलब्ध होगी, जनमानस का इंटरनेट के प्रति रुझान भी बढ़ता जाएगा।

... और एक गर्मागर्म विवाद

इतने समर्पित लोगों की प्रिय परियोजना 'नारद' को लेकर पिछले दिनों एक विवाद भी खड़ा हो गया जब एनडीटीवी चैनल के पत्रकार अविनाश दास की ओर से संचालित 'मोहल्ला' नामक सामूहिक ब्लॉग पर धर्म के संवेदनशील मुद्दे पर छपी कुछ टिप्पणियों पर आपत्तियां उठाई गईं। 'मोहल्ला' ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर टिप्पणियों के लिए जाना जाता रहा है और उसके माध्यम से हिंदी ब्लॉगजगत को कुछ अच्छे टिप्पणीकार मिले हैं। चूंकि 'नारद' एक ब्लॉग एग्रीगेटर है, जिस पर सभी पंजीकृत ब्लॉगों की टिप्पणियां दिखाई देती हैं, सो 'मोहल्ला' की यह विवादास्पद टिप्पणी भी वहां प्रदर्शित हुई । कई ब्लॉगरों की नजर में यह टिप्पणी ईश-निंदा के दायरे में आती है और वे मानते हैं कि उसे लेकर भारतीय दंड विधान के तहत कार्रवाई भी संभव है। अन्य ब्लॉगर इसे 'सेकुलर' टिप्पणी मानते हैं और उन्हें लगता है कि इसके विरोध में संघवादियों का हाथ है। इस तरह की आशंकाओं ने 'नारद' की अनुभवी टीम को भी डरा दिया और उसने 'मोहल्ला' को इस एग्रीगेटर से हटाने का फैसला किया। इस मुद्दे पर हिंदी ब्लॉग जगत में साफ विभाजन दिखाई दिया और आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया। एक ओर 'मोहल्ला' के खिलाफ हिंदुत्ववादियों की मुहिम शुरू हो गई तो दूसरी ओर 'मोहल्ला' के प्रति सहानुभूति रखने वालों ने 'नारद' को उखाड़ फेंकने का अभियान शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया में कुछ अन्य लोग भी जुट गए और लानत-मलामत का अप्रिय दौर शुरू हुआ जिसने हिंदी ब्लॉग जगत का माहौल प्रदूषित किया। कुछ ब्लॉगरों ने टिप्पणी की कि अविनाश का कोई 'हिडन एजेंडा' है जिसे वे ब्लॉग जगत पर थोपना चाहते हैं। कुछ अन्य ने कहा- मोहल्ला को प्रतिबंधित करने का कदम उन कट्टरपंथी मध्ययुगीन मुल्लाओं से अलग नहीं है जो कलाकारों, लेखकों, औरतों, फिल्मकारों की आजादी से खौफ खाते हैं और उनके खिलाफ फतवे जारी करते हैं। वे हर प्रकार की असहमतियों को दबा देना चाहते हैं।

इस विवाद ने स्वाभाविक रूप से, नारद की टीम को बहुत व्यथित किया और जीतेंद्र चौधरी ने टिप्पणी की,

मुझे लगता है कि  मोहल्ला प्रकरण एक अनावश्यक विवाद था। मुझे न जीतेंद्र चौधरी की निष्पक्षता, राजनैतिक तटस्थता और ब्लॉगिंग विधा के प्रति समर्पण में कोई संदेह है और न ही इस आरोप पर विश्वास होता है कि अविनाश और उनके साथियों ने हिंदुत्व के विरुद्ध कोई साजिश की है। मुझे तो यह विवाद कम्युनिकेशन-गैप और अति उत्साह का परिणाम लगता है। हड़बड़ी में उठाए गए कुछ कदमों और उनकी तीखी, त्वरित प्रतिक्रियाओं ने बात का बतंगड़ बना दिया।

"आज दिल व्यथित है, बहुत ज्यादा। कुछ चिट्ठाकारों द्वारा नारद की निंदा किए जाने और कुछ अन्य लोगों द्वारा उसे बढ़ावा दिए जाने के बाद। आज मैं आत्मचिंतन करने पर मजबूर हो गया हूं कि आखिर हम इतना सब किसके लिए कर रहे हैं? ऐसे लोगों के लिए जिन्हें इतनी समझ नहीं कि वे अपनी मनमानी ना होने पर किसी की भी बेइज्जती करने से न चूकें या उनके लिए जो इन लोगों को परोक्ष रूप से उकसा रहे हैं, या फिर उनके लिए जो मूक दर्शक बने सब कुछ देख रहे हैं। मैं बहुत गंभीरतापूर्वक नारद, अक्षरग्राम और उससे जुड़ी अन्य परियोजनाओं से हटने की सोच रहा हूं।"

दूसरी ओर अविनाश और उनके साथी ब्लॉगरों को इन टिप्पणियों से चोट पहुंची कि उनकी विचारधारा मुस्लिम तुष्टीकरण की है और हिंदुत्व के विरुद्ध वे कोई सुनियोजित साजिश बनाकर चल रहे हैं। इस दौरान उनके ब्लॉग को कैंसर की उपमा दी गई , और 'महाशक्ति' ने लिखा- "इन लोगों की स्थिति मोहल्ले के गंदे सुअर की तरह है कि आप उन्हें कितना भी अच्छा खाना दीजिए किंतु अपशिष्ट पदार्थ के बिना उनका पेट नहीं भरता।"

इन टिप्पणियों से दुखी अविनाश ने लिखा- मोहल्ले के सरोकार अल्पसंख्यकों, दलितों और स्त्रियों से जुड़े हैं और उनकी हिमायत करने वाला विमर्श हम आगे भी जारी रखेंगे। दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे पर दोषारोपण किया, एक-दूसरे को आहत किया, एक-दूसरे पर सांप्रदायिक और हिंदूविरोधी के लेबल चस्पा किए। कुछ अन्य लोग भी वाणिज्यिक या राजनैतिक कारणों से इस मुकाबले में हाथ सेंकने कूद पड़े। उन्होंने अपने तरीके से इसका लाभ भी उठाया और नुकसान में रहे तो विवाद से सीधे जुड़े हुए दोनों पक्ष ही। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक विवाद था। मुझे न जीतेंद्र चौधरी की निष्पक्षता, राजनैतिक तटस्थता और ब्लॉगिंग विधा के प्रति समर्पण में कोई संदेह है और न ही इस आरोप पर विश्वास होता है कि अविनाश और उनके साथियों ने हिंदुत्व के विरुद्ध कोई साजिश की है। मुझे तो यह विवाद कम्युनिकेशन-गैप और अति उत्साह का परिणाम लगता है। हड़बड़ी में उठाए गए कुछ कदमों और उनकी तीखी, त्वरित प्रतिक्रियाओं ने बात का बतंगड़ बना दिया। इस बीच विभिन्न लोगों की ओर से आई कुछ विवादास्पद टिप्पणियों ने आग को और हवा दी। बहरहाल, मामला फिलहाल ठंडा पड़ चुका है और 'मोहल्ला' 'नारद' पर लौट चुका है। एक तरह से इसे हिंदी ब्लॉगिंग की परिपक्वता की निशानी भी माना जा सकता है कि वह इस तरह के विवाद से अंतत: बाहर निकलने में सफल रही। हम प्रिय-अप्रिय अनुभवों से सीखते हुए ही आगे बढ़ते हैं और मजबूत भी बनते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि धीरे-धीरे ब्लॉगर साथी इन अप्रिय स्मृतियों से उबर कर फिर से एक साथ, अपने सार्थक काम में जुट जाएंगे।

सीमाएं और चुनौतियां

हिंदी ब्लॉगिंग के स्वस्थ विकास के लिए कुछ मुद्दों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। जिस तरह ब्लॉगरों की संख्या में वृद्धि की दर दूसरी भाषाओं की तुलना में काफी कम है, उसी तरह यहां पाठकों का भी टोटा है। हिंदी ब्लॉग विश्व को चिंतन करना होगा कि वह आम पाठक तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? क्या इसलिए कि हिंदी ब्लॉगिंग में विविधता का अभाव है? क्या इसलिए कि इसमें मौजूद अधिकांश सामग्री समसामयिक विषयों पर टिप्पणियों, निजी कविताओं, पुराने लेखों तथा प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं को इंटरनेट पर डालने तक सीमित है? क्या इसलिए कि हिंदी ब्लॉगों की भाषा अभी विकास के दौर से गुजर रही है और पूरी तरह मंजी नहीं है? क्या इसलिए कि हिंदी ब्लॉगों की सामग्री सुव्यवस्थित ढंग से उपलब्ध नहीं है बल्कि छिन्न-भिन्न है जिसमें मतलब की चीज ढूंढना चारे के ढेर में सुई ढूंढने के समान है? या फिर इसलिए कि पत्र-पत्रिकाओं में खूब छपने के बावजूद हिंदी पाठक अभी तक ब्लॉगिंग को तकनीकी अजूबा मानते हुए उनसे दूर हैं?

इंटरनेट आधारित साहित्यिक पत्रिका सृजनगाथा.कॉम के संपादक और ब्लॉगर जयप्रकाश मानस कहते हैं, "जहां तक हिंदी ब्लॉगिंग की भाषा का प्रश्न है, वह अभी परिनिष्ठित हिंदी को स्पर्श भी नहीं कर सकी है। वहां भाषा का सौष्ठव कमजोर है। अधिकांश ब्लॉगर नगरीय परिवेश से हैं, ऊपर से हिंदी के खास लेखक और समर्पित लेखक ब्लॉग से अभी कोसों दूर हैं, सो वहां भाषाई कृत्रिमता और शुष्कता ज्यादा है। वहां व्याकरण की त्रुटियां भी साबित करती हैं कि अभी हिंदी ब्लॉगिंग में भाषा का स्तर अनियंत्रित है।" अविनाश भी इससे सहमत दिखते हैं, "हिंदी ब्लॉगिंग की अभी कोई शक्ल नहीं बन पाई है। विविधता के हिसाब से भी अभी विषयवार ब्लॉग नहीं हैं। लेकिन जो हैं, वे जड़ता तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।"

हालांकि कई लेखक लीक से हटकर चलने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। अतुल अरोरा और सुनील दीपक के संस्मरण और यात्रा वृत्तांत, रवि
जयप्रकाश मानस कहते हैं, "जहां तक हिंदी ब्लॉगिंग की भाषा का प्रश्न है, वह अभी परिनिष्ठित हिंदी को स्पर्श भी नहीं कर सकी है। वहां भाषा का सौष्ठव कमजोर है।
रतलामी, श्रीश शर्मा, जीतेन्द्र चौधरी, देबाशीष, पंकज नरूला, ईस्वामी, अमित गुप्ता, प्रतीक पांडेय
आदि के तकनीकी आलेखों का स्तर बहुत अच्छा है। प्रत्यक्षा जैसी कथालेखिका, अशोक चक्रधर, बोधिसत्व जैसे कवि और जयप्रकाश मानस, प्रमोद सिंह, प्रियंकर जैसे साहित्यकार-ब्लॉगर, आलोक पुराणिक जैसे सक्रिय व्यंग्यकार और रवीश कुमार, चंद्रभूषण, इरफान जैसे पत्रकार भी अच्छी, विचारोत्तेजक ब्लॉगिंग कर रहे हैं। लेखक ने स्वयं अपने ब्लॉग 'वाहमीडिया' को विविधता के लिहाज से मीडिया की आत्मालोचना पर केंद्रित रखा है। कमल शर्मा का 'वाह मनी' आर्थिक विषयों पर केंद्रित है और आलोक का 'स्मार्ट मनी' निवेश संबंधी सलाह देता है। 'फुरसतिया' और 'मोहल्ला' पर कई ऊंचे दर्जे के साक्षात्कार और लेख पढ़े जा सकते हैं। नीलिमा हिंदी ब्लॉग जगत में पाठकों-लेखकों संबंधी आंकड़ों की गहन छानबीन कर रही हैं। मनीषा स्त्री विमर्श के मुद्दों पर साहसिक लेखन कर रही हैं। लेकिन विविधता अभी और भी चाहिए। जीतेन्द्र चौधरी भी यह बात मानते हैं- "लेखन के विषयों और गुणवत्ता पर काफी कुछ किया जाना बाकी है। आसपास कई ऐसे चिट्ठाकार आए हैं जिनके लेखन में विविधता है और लेखन भी काफी उत्कृष्ट कोटि का है। लेकिन बहुसंख्यक ब्लॉग ऐसे हैं जो निजी डायरी के रूप में ही चल रहे हैं।"

अनगढ़ भाषा कोई अड़चन नहीं!

वैसे एक मजेदार तथ्य यह भी है कि भाषा के लिहाज से बेहद कमजोर माने जाने वाले कुछ ब्लॉग लोकप्रियता में परिमार्जित भाषा वाले ब्लॉगों से कहीं आगे हैं। तत्वज्ञानी के हथौड़े की भाषा देखिए- "वेसे अगर आपके जमाने कि बात करे तो भी लता से बहेतर बहुत सी गायिकाए होन्गी लेकिन आपकि कमजोर संगीत सुझकि बजह से वह आपको दिखी नहि! शायद आप पोप्युलर गाने हि सुनते थे इसिलिए शमशाद बेगम को भुल गए। शायद लताजी फिल्मों में राजनिति करती थी और इसलिए कोई और आपके जमाने मे से उभर नहि पाया? मुझे अफसोस होता है कि आप लोगो ने केवल २-३ अछछी गायिकाए दी!" और शुएब को देखिए, "अपने विचारों को शेर करने के लिए मेरा ब्लॉग काफी है और मेरी डाईरी यही ब्लॉग है। भारत मेरा पहला धर्म है जहां मैं पैदा होवा और उसी के बनाए कानून के मुताबिक कोर्ट में शादी करूंगा मगर एसी लड़की मिलेगी कहां?"

कहना न होगा कि व्याकरण संबंधी त्रुटियों के बावजूद ये दोनों ब्लॉगर सर्वाधिक पढ़े जाने वालों में से हैं। भाषा की बात चली है तो कुछ स्थानों पर असहज और चौंका देने वाली भाषा भी दिखती है। इस संदर्भ में कुछ शीर्षकों की मिसालें भी दी जा सकती हैं, "सब मोहल्ले का लौंडपना है", "क्या इस देश को चूतिया बनाया जा रहा है?" आदि आदि। भाषायी सुरुचि और शालीनता में विश्वास रखने वाले शुद्धतावादियों को शायद इन टिप्पणियों को पढ़कर भी निराशा होगी-

1. "आपके चिट्ठे की टिप्पणियों में बेनामों की विष्ठा के अलावा कोई भी नामधारी टिप्पणी क्यों नहीं है?",
2. "बेंगाणी एक गंदा नैपकिन है",
3. "ये लोग (एक ब्लॉगर) आतंकवादी से भी खतरनाक हैं। ये हमेशा आग लगाने की फिराक में रहते हैं।"

जयप्रकाश मानस कहते हैं, "सार्थक अर्थों में वैचारिक, अर्थशास्त्रीय, चिकित्सा, इतिहास, लोक अभिरुचि और साहित्यिक ब्लॉग नहीं के बराबर हैं। हिंदी ब्लॉगरों के उत्साह को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए ब्लॉगिंग के विषयों और उसके कोणों में विविधता और विश्वसनीयता आवश्यक है अन्यथा इनकी स्थिति भी वैसी ही हो जाएगी जैसे किसी दैनिक अखबार के संपादक को कई बार किसी कल्पित नाम से 'संपादक के नाम पत्र' छापना पड़ता है।'

लेखकों के साथ-साथ हिंदी ब्लॉगों के पाठक कैसे बढ़ें? रवि रतलामी के अनुसार, "फिलहाल हिंदी ब्लॉग जगत के अधिकतर पाठक वे ही हैं जो किसी न किसी रूप से स्वयं ब्लॉगिंग से जुड़े हुए हैं। उनमें से अधिकतर स्वयं सक्रिय रूप से ब्लॉग लिखते हैं।" अनूप शुक्ला भी यह बात स्वीकार करते हैं, "पाठक तब बढ़ेंगे जब हिंदी में तकनीक का प्रसार होगा। हमारे समाज में कंप्यूटर और नेट का पूरी तरह से उपयोग होना बाकी है। जैसे-जैसे मीडिया में ब्लॉगिंग का प्रचार होगा, वैसे-वैसे पाठक संख्या में भी वृद्धि होगी।" आलोक कुमार इस संदर्भ में बड़ी कंपनियों के पहल करने की जरूरत महसूस करते हैं, "बड़े पोर्टल और बड़ी कंपनियां हिंदी भाषियों की जरूरतों को पूरा करने में पीछे रह गई हैं। इस समय जो भी बड़ी कंपनियां व पोर्टल आगे आकर हिंदी के स्थल बनाएंगे उनके पीछे हिंदी भाषियों की बहुत बड़ी टोली हो लेगी।"

यानी हिंदी ब्लॉगिंग को भी बड़े संस्थानों के समर्थन की जरूरत है। शायद आलोक कुमार ठीक कहते हैं। ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर और संस्थागत आधार पर तैयार किए गए सॉफ्टवेयरों की तुलनात्मक स्थिति को देखकर भी यह धारणा पुष्ट होती है कि आम लोगों द्वारा किए जाने वाले असंगठित तकनीकी प्रयासों को किसी न किसी दिशानिर्देशक या व्यवस्थागत समर्थन के बिना उतनी बड़ी सफलता नहीं मिल पाती जिसके वे वास्तव में हकदार होते हैं।

(लेखक हिंदी पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक हैं और 'वाह मीडिया' (हिंदी) तथा 'localisationlabs' (अंग्रेजी) नामक ब्लॉग का संचालन भी करते हैं।
email: balendu@gmail.com, baalendu@yahoo.com




आपने जो कहा... (44 प्रतिक्रियाएं)

* लेख में ब्लागिंग के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुये हिंदी ब्लागिंग से जुड़े हुये तमाम मुद्दों, जिनमें विवादित मुद्दे भी शामिल हैं, की भी निष्पक्ष जानकारी देने की ईमानदार कोशिश की गयी है। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि ब्लाग से संबंधित जानकारी के लिये सात पेज कादम्बिनी पत्रिका ने दिये हैं। ब्लागिंग से जुड़े तमाम लोगों से बातचीत करके बहुत मेहनत से लिखे गये इस लेख के अंश देना आपको उस सुख से वंचित करना होगा जो आपको खुद इस लेख को पूरा पढ़ने के दौरान मिलेगा।
- अनूप शुक्ला (http://hindini.com/fursatiya/?p=346) की फुरसतिया में लिखी टिप्पणी 1 अक्तूबर 2007

* प्रिय बालेंदु भाई, कादम्बिनी का अंक कल ही पढ़ा, व संपूर्ण आलेख आज पढ़ा। मुझे लगता है कि कादम्बिनी में इस  शानदार लेख को नाहक संपादित किया गया। लेख परिपूर्ण है, और आपकी मेहनत उसमें झलकती है. यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया है। मैंने इसका लिंक रचनाकार व अपने चिट्ठे पर दिया है।
- रवि रतलामी (http://raviratlami.blogspot.com)

* मैंने आज यह लेख दुबारा पढ़ा। बहुत मेहनत और ईमानदारी से लिखे इस लेख के लिये बहुत-बहुत बधाई। आपने जिस खूबी से ब्लाग और सारे हिंदी ब्लाग जगत की सारगर्भित जानकारी दी उससे मन खुश हो गया यह लेख पढ़कर। नारद, मोहल्ला और अन्य विवादों के बारे में जिस सफ़ाई से आपने लिखा उससे आपके लेखन का मुरीद हो गया मैं। टिप्पणियां भी अच्छी लगीं। अब आपसे एक अनुरोध यह है कि आप इस लेख में संबंधित सभी ब्लागर्स के लिंक डाल दें तो सोने में सुहागा। कादम्बिनी में तो इसकी सुविधा न थी लेकिन नेट पर तो है। आपको एक बार फिर से बधाई!
- अनूप शुक्ला (http://hindini.com/fursatiya) 2 अक्तूबर 2007
(अनूप भाई, बहुत अच्छा सुझाव है। सभी ब्लॉगर साथियों के लिंक जल्दी ही लगा दिए जाएंगे- बालेन्दु)


* बहुत अच्‍छा काम किया है आपने। लेकिन अफसोस यही है कि आपके अपने योगदान का उल्‍लेख रह गया। बहुत बहुत साधुवाद।
- अविनाश (http://mohalla.blogspot.com)

* आपका ब्लॉग वाला लेख शुरू से आख़िर तक पढा और बहुत नई जानकारी मिली। अपने लेखों से भविष्य में भी कभी वंचित न करें।
- प्रो. सुरेन्द्र गंभीर (पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय)

* एक अच्छा लेख। बालेन्दु चिट्ठाकारी और पत्रकारिता से काफी समय से जुड़े हुए हैं। उनसे इसी तरह के उत्कृष्ट लेख की आशा थी। बालेन्दु को एक अच्छे लेख के लिए धन्यवाद।
- जीतेन्द्र चौधरी (http://www.jitu.info)

*  इंटरनेट की दुनिया को समझने, हिन्दी को इंटरनेट पर स्थापित करने, अपनी बात को अपनी भाषा में कहने और अपने आसपास हो रही घटनाओं को दुनिया और समाज के सामने लाने की कोशिश में लगे हर व्यक्ति को श्री बालेंदु दाधीच का यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए। बालेन्दु जी, हमने मीडिया के सभी साथियों को आपके लेख के बारे में लिंक भेजा है। लेख का लिंक - http://www.hindimedia.in/content/view/452/28/
- शिवानी जोशी/ चंद्रकांत जोशी (हिंदी मीडिया चैनल, मुंबई)

* ब्लॉग की दुनिया पर आपका लिखा लेख पढा ! इस विस्तृत और शोधपरक लेख में आपने ब्लॉग जगत के लगभग हर पहलू को समेट लिया है ! मेरे शोध की दृष्टि से भी यह लेख बहुत महत्वपूर्ण है ! इतना गंभीर लेख पढवाने के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया !
- नीलिमा (http://linkitmann.blogspot.com)

* मैंने हिंदी ब्लॉगिंग पर इससे अच्छा और विस्तृत लेख नहीं पढ़ा। आपने गजब की मेहनत की है। मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं। ब्लॉगिंग निस्संदेह एक सशक्त माध्यम है।
- पंकज बेंगानी (http://www.tarkash.com)

* आपका हिन्दी ब्लॉगिंग पर लिखा लेख पढ़ा. ऐसा विस्तृत व निष्पक्ष लेख पहली बार लिखा गया है।  शुभकामनाएं व साधूवाद।
- संजय बेंगानी (http://www.tarkash.com)

* मैं आपके आलेख को बिलकुल घटिया मानता हूँ। पता नहीं आपने कैसे यह आलेख तैयार किया है। मुझे लगता है कि केवल आपने अपने सम्पर्क में होने वाले ब्लॉगरों से चर्चा की है। जबकि हिन्द-युग्म ब्लॉग अभी का सक्रियतम ब्लॉग है और आपने उसकी चर्चा भी नहीं की है। आप जैसे पत्रकारों के कारण सच हमेशा परदे में रह जाता है। लानत है आप पर।
- शैलेश भारतवासी
(शीशा दिखाने के लिए धन्यवाद शैलेश भाई।  ब्लॉगिंग में हिंद-युग्म   का यकीनन अहम योगदान है-  बालेन्दु)

* मैं शैलेशजी की बात का विरोध करता हूं। हिंद-युग्म निस्संदेह एक अच्छा प्रयास है जिसका उल्लेख होना चाहिए था। लेकिन शैलेशजी की भाषा एकदम गलत है। उनका यह कहना कि आपने सिर्फ उन लोगों के बारे में लिखा जो आपके संपर्क में हैं, कितना गलत है। मैं तो आपको जानता ही नहीं था, कभी मेल तक नहीं किया था। :-(
- पंकज बेंगानी

* इस लेख को लघु रिसर्च रिपोर्ट कहा जा सकता है। पूरा लेख पढ़े बगैर नहीं रह सकते। वाकई आपने खूब मेहनत की है इसे लिखने में। अभी तक ब्‍लॉग और ब्‍लॉगिंग पर प्रकाशित कई लेख पढ़े लेकिन इससे बेहतर और मजेदार नहीं थे। भाई शैलेश जी ने जो नाराजगी व्‍यक्‍त की है उससे मैं सहमत नहीं हूं क्‍योंकि आप और मैं एक दूसरे को कतई नहीं जानते और आपने वाह मनी ब्‍लॉग का जिक्र किया है। उम्‍मीद है भाई शैलेश जी की नाराजगी आपकी संक्षिप्‍त टिप्‍पणी से जरुर दूर हुई होगी। ऐसी रिपोर्ट लिखते समय कुछ नाम छूट सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि कार्य करने वालों का योगदान कम हो जाता है।
- कमल शर्मा (http://wahmoney.blogspot.com)

* बालेन्दु जी, आप अपनी वेबसाइटों के जरिए जितना कार्य कर रहे हैं उसे  देखकर मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूं। वैसे यह इस बात का रिमाइंडर भी है कि आपका यूनिकोड हिंदी संपादक सॉफ्टवेयर अब जल्दी ही आ जाना चाहिए।
- शास्त्री जेसी फिलिप (http://www.sarthi.info)

* आपका आलेख देखा और बहुत पसँद आया। आप द्वारा बनाये गये अन्य कई वेब भी देखे। ८ वे. विश्व हिन्दी सम्मेलन का ऐतिहासिक वेब पोर्टल बना कर आपने महत्त्वपूर्ण और यशस्वी कार्य किया है। उसके लिये आपको बहुत बहुत, बधाई !मेरा परिचय दे दूँ - मैं स्व.पंडित नरेन्द्र शर्मा की बेटी हूं। हिन्दी चिठ्ठा जगत पर मेरा भी एक ठिकाना है।
- लावण्या शाह (http://lavanyam-antarman.blogspot.com)

*  अभी-अभी कादम्बिनी में ब्लॉगिंग पर आपका लेख पढ़ा। इससे पहले भी कादम्बिनी में ब्लॉग के बारे लेख छ्प चुका है। लेकिन जितना व्यापक और संपूर्ण आपका लेख उसके मुकाबले अब तक के लेख कहीं नहीं ठहरते। आपकी मेहनत इस लेख में साफ झलकती है। क्या आप सारे चिट्ठे पढ़ते हैं क्योंकि हिन्दी के जितने भी प्रमुख चिट्ठाकार हैं लगभग सभी का जिक्र आपके लेख में है। इतने अच्छे लेख के लिये हार्दिक धन्यवाद स्वीकार करें। अभी नैट पर भी आपका पूरा लेख पढ़ा। खुशी हुई। यदि हो सके तो जिन चिट्ठाकारों का नाम है उनका लिंक भी दे दें जिससे जो भी इस लेख को पढ़े वो उन चिट्ठाकारों तक भी पहुंच सके। यह नैट पर हिन्दी के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभायेगा।
- काकेश कुमार (http://kakesh.com)
(धन्यवाद काकेश भाई, थोड़ा व्यस्त हूं। पर लिंक डालने का काम जल्दी ही हो जाएगा- बालेन्दु) 
* नेट पर ब्लागिंग से संबंधित आपका यह लेख बहुत महत्वपूर्ण और दस्तावेजी है। आप "सेतु साहित्य" के लिए www.setusahitya.blogspot.com   पर क्लिक कर सकते हैं। यह अनुवाद केंद्रित पत्रिका है।
- सुभाष नीरव

* दिल प्रसन्न हो गया इतना उपयोगी लेख पढ़कर। यदि ब्लोगिंग के सम्बन्ध में ऐसी उपयोगी और गहन जानकारी देने के लिए आप जैसे लोग जुट जाएँ तो हिन्दी के भविष्य को उज्जवल होने से कोई नहीं रोक सकता है। अंग्रेजी की हालत तो वैसे भी पतली होती नज़र आ रही है। आपको जोरदार बधाई, अंग्रेजी के विरुद्ध और अभिव्यक्ति की अनुगूँज के लिए ब्लोगिंग के उपयोग पर।
- अविनाश वाचस्पति (http://avinashvachaspati.blogspot.com )

* मैंने आपका पूरा आलेख पढ़ा। मैं कई बार प्रभासाक्षी देखता हूं। आज पता चला कि उसका संपादन आप संभाल रहे हैं। आपकी पूरी रचना बड़ी ही तथ्यपरक लगी और पढ़कर प्रतीत हुआ कि लेखन को बड़े ही गहन विश्लेषण के बाद अंजाम दिया गया है। बधाई स्वीकारें।
- मुरली मनोहर श्रीवास्तव (http://murlimanoharsrivastava.blogspot.com)

* आपकी वेबसाइट देखकर बहुत अच्छा लगा। आपके सॉफ्टवेयर भी बहुत निराले हैं।
- रूपेश कुमार तिवारी (roopkt@gmail.com)

* आपने ब्लॉगिंग की दुनिया की एक मुकम्मिल तस्वीर इस आलेख में पेश कर दी है। बहुत बहुत बधाई। मैं इस लेख को अपने कई मित्रों को भेज रहा हूं।
- दुर्गाप्रसाद अग्रवाल (http://www.indradhanushindia.org )

* ब्लॉगिंग पर केंद्रित आपका संपूर्ण आलेख  पढ़ा, वाकई आपने "संजय" सी दृष्टि डालते हुए चौतरफ़ा नज़र डाली है!! निश्चित ही हिन्दी ब्लॉगिंग में इस लेख को एक मील का पत्थर माना जाएगा। साधुवाद के साथ धन्यवाद भी स्वीकार करें।
- संजीत त्रिपाठी (http://sanjeettripathi.blogspot.com/

* आपका लेख पढ़ रहा था कादंबिनी वाला, ब्लॉग पर। बहुत विस्तृत और ढेर सारी रिसर्च के बाद लिखा है, अच्छा लगा।
- राजेश प्रियदर्शी (बीबीसी हिंदी.कॉम)

* काफ़ी पहले हमने बालेंदु दाधीच के दो लेख ( युनिकोड पर) दीवान पर डाले थे, सहारा से उठाकर। ये रहा चिट्ठाकारी पर उनका एक हालिया लेख, मज़े लें। हमारे सभी साथी कादंबिनी तो नहीं पढ़ते, गो यह तय है क