• 'दोस्त' ही यदि ऐसा हो तो दुश्मनों की क्या जरूरत!
  • आसमान छूती महंगाई, छलांग मारती ब्याज दरें
  • आडवाणी वही कर रहे हैं जो विपक्ष को करना चाहिए
  • लोकतंत्र और लचीलेपन में निहित है समाधान
  • सबको चाहिए अपनी.अपनी सुविधा का लोकपाल
  • मुद्रास्फीति और बढ़ते ब्याज का अंतहीन सिलसिला
  • उनका भ्रष्टाचार बनाम इनका भ्रष्टाचार
  • गलतियां रेल मंत्रालय की, दोष ड्राइवरों के सिर
  • स्वाभाविक पहचान से आगे बढ़ने की बेताबी
  • मशीनी अनुवाद: कुछ खरा, कुछ खोटा
  • मुद्दे को ही भारी पड़ गया यह आंदोलन
  • वह विपक्ष का काम है जो रामदेव.हजारे कर रहे हैं
  • पर्दा जो उठ गया तो बलूचिस्तान याद आया
  • राजनीति में जब वक्त बदलता है
  • कल के दिग्गजों को हाशिये पर भी जगह नहीं
  • अंतरराष्ट्रीय बदनामी के 'आफ्टर इफेक्ट्स'
  • ध्वस्त होना आतंकवाद के सबसे बड़े प्रतीक का
  • इंटरनेट पर नियंत्रणों का विशुद्ध भारतीय स्टाइल
  • वही सवालों में घिर गए, जिन्हें मांगने थे जवाब
  • बहुत जल्द अन्ना हजारे से जवाब मांगेगी जनता
  • विराम एक अपराध होगा इस युद्ध में
  • अगवानी कीजिए क्रिकेट के नए शहंशाह की
  • मुसाफिरों को इंसान कब समझेगा रेल बजट
  • जनक्रांतियों में दिखते इंटरनेट के फिंगर प्रिंट
  • तानाशाही का जाना मगर लोकतंत्र का न आना
  • घिरती सरकार, सिकुड़ते विकल्प
  • महंगाई और भ्रष्टाचार से ध्यान हटाएगी यह यात्रा
  • जनता के लिए, जनता के द्वारा: विकीपीडिया
  • कश्मीर में सच तो खुला मगर आधा.अधूरा
  • पीएसी की जांच से जेपीसी में क्या नुकसान
  • उम्मीदों भरी यात्रा पर निराशा का कुहासा
  • चीन से ज्यादा जरूरी था लोकतंत्र का साथ देना
  • यह राजनैतिक पराक्रम है सामाजिक क्रांति नहीं
  • आश्वस्त बिहार का सकारात्मक जनादेश
  • आधिकारिक वार्ताकार ओसामा बिन लादेन!
  • हिंदुस्तानी मेहमाननवाजी से पहले थोड़ी खरी.खरी
  • वार्ताकारों की चुनौती और बढ़ा गए गिलानी
  • पिछड़ेपन की निशानियों से छुटकारे का वक्त
  • इस जीत का सेहरा सबके नाम
  • जापान को झुकाकर चीन ने क्या पाया
  • कश्मीर में सेना को बलि का बकरा मत बनाइए!
  • अपनी नाकामी का दोष हिंदी को क्यों दें?
  • 'पोलीटिकली इनकरेक्ट' बात कह गए मनमोहन
  • चीन के पड़ोस तक पहुंचती हिंदुस्तानी कूटनीति
  • चीनी चौधराहट के रणनीतिक मायने
  • अहं और संदेह की बाढ़ में डूब.उतराता पाकिस्तान
  • पाकिस्तान के दोगलेपन का इंटरनेटीय पर्दाफाश
  • अर्थव्यवस्था की उड़ान को मिला एक निशान
  • पास आते.आते दूर क्यों चला जाता है कश्मीर?
  • अंबानी घराने के विवाद का 'सुखांत' कितना स्थायी
  • छोटी बहस में खो गए गैस हादसे के बड़े सवाल
  • खुलने लगे चीनी 'आर्थिक चमत्कार' के पैबंद
  • शांति प्रस्तावों के और कितने जवाब चाहिए!
  • 3जी नीलामी की सफलता बड़ी या 2जी का घोटाला?
  • आगाज़ तो अच्छा है, अंजाम खुदा जाने
  • स्टीफन हाकिंग की आशंका और कुछ जरूरी प्रतिप्रश्न
  • वंशवादी राजनीति की विडंबना हैं अलागिरी
  • पूछताछ का हक भी नहीं छोड़ा उपभोक्ता के पास!
  • ताकि आतंकवादियों के हाथ न लगे परमाणु बम
  • मध्ययुगीन बर्बरता और सामाजिक चुप्पी के विरुद्ध
  • हेडली के बयान को कैसे नकारेगा पाकिस्तान
  • लश्कर की 'हरकतें' और अमेरिका का राग विलंबित
  • शतक दर शतक, देश को जोड़ता एक 'भारत रत्न'
  • अंक बटोरकर निकल गए पाकिस्तानी विदेश सचिव
  • आमिर खान को गुस्सा क्यों आता है
  • आने वाली पीढि़यों को भारी न पड़े यह बैंगन!
  • अफगानिस्तान में प्रासंगिक बने रहने की चुनौती
  • आईपीएल: कारोबारी निर्णयों में भावुकता की जगह नहीं
  • विडंबनाओं की पगडंंडी से निकलता दोस्ती का हाईवे
  • अमर सिंह को बहुत देर से दिखा सपा का परिवारवाद
  • क्या नए राज्यों के मुद्दे का स्थायी हल संभव है?
  • एक प्रतीकात्मक दस्तावेज में निपट गया कोपेनहेगन
  • एक अनशन ने बांट दिया करोड़ों तेलुगूभाषियों को
  • जिन्हें पाक ने दोषी माना वे तो महज कलपुर्जे हैं
  • चीन से निकटता ओबामा की मजबूरी है, हमारी नहीं
  • सच, साहस और सरोकार, यानी प्रभाष जोशी
  • स्पेक्ट्रम विवाद में नैतिक साहस दिखाएं मनमोहन
  • महज बयानों से हल नहीं होगी चीन की चुनौती
  • नक्सलियों की तरफ से तो जंग शुरू हो चुकी
  • जवाबों से ज्यादा सवाल दे दिए चीनी शक्ति प्रदर्शन ने
  • धरती की उम्मीद जगा दी चंद्रमा के पानी ने
  • पिछड़ेपन की भाषा बनने को अभिशप्त नहीं हिंदी
  • जितना बढ़ेगा भारत, उतनी बढ़ेगी चीनी चुनौती
  • जो हम नहीं कर सके वह पााकिस्तान कर रहा है
  • संथानम ने हमारी परमाणु शक्ति पर प्रश्न नहीं उठाया
  • कुछ महीने रुकते तो बच जाते जसवंत सिंह
  • परमाणु शक्तियों के टुकड़े नहीं किए जाते
  • क्योंकि हिंदी के मायने सिर्फ साहित्य नहीं है
  • अगर यही 'सबसे बड़ी भूल' है तो फिर वे सब क्या थीं?
  • बलूचिस्तान: बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
  • यह महंगा उपहार पाक के लिए या हिलेरी के लिए?
  • यूं ही खारिज नहीं कर सकते लालू के पांच साल
  • खुलने लगी हैं सामाजिक वर्जनाओं की बंद खिड़कियां
  • निलेकणी जैसों को शाबासी नहीं, सहयोग चाहिए
  • वोटों में क्यों नहीं बदला इंटरनेट का प्रचार युद्ध
  • पाकिस्तान से बातचीत करें तो आखिर क्या?
  • मंत्री कैसे भी हों, इतिहास तो प्रधानमंत्री को परखेगा
  • महज विदेशी नौकरियों का मुद्दा नहीं है आउटसोर्सिंग
  • साथ.साथ नहीं रह सकते थे आतंकवाद और 'ईलम'
  • अमेरिकी अपराध बोध: बड़ी देर की मेहरबां आते.आते
  • लड़ाई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के बीच भी
  • गैर.बराबरी के विरुद्ध एक 'पूंजीवादी औजार' है नैनो
  • जब मीडिया आतंकवाद के हाथों इस्तेमाल हो जाए
  • लोकतंत्र व तानाशाही का फर्क धुंधलाया पाकिस्तान में
  • चार्जशीट आ गई तो पाक खंडन भी आता ही होगा
  • कल जो अफगानिस्तान था, वह कल का पाकिस्तान है?
  • जापान में जो देखा: धार्मिक आस्था कोई विवशता नहीं
  • जापान में जो देखा: बिखर रहा है समाज का तानाबाना
  • जापान में जो देखा: फिरंगी शैली तो अपनाई, भाषा नहीं
  • जापान में जो देखा: विदेशी भूमि के अनूठे संस्कार
  • जापान में जो देखा: गर्व से लहराता हिंदी का ध्वज
  • तो क्या जरदारी को कसाब का राशनकार्ड लाकर दें?
  • न भाजपा की बड़ी हार, न कांग्रेस की बड़ी जीत
  • ये कल के पगड़ीधारी और अर्धसाक्षर जेहादी नहीं हैं
  • पाकिस्तान मार्का हमले और नाम 'डेक्कन मुजाहिदीन'!
  • 'जनशक्ति' वाले राष्ट्र की 'जलशक्ति' भी तो देखिए
  • जान पर बन आई तो याद आए विकासमान देश
  • चुनाव के रास्ते भी आती हैं सामाजिक क्रांतियां
  • हिंदुस्तानी इलाज से स्वस्थ नहीं होगा शेयर बाजार
  • ऐसी बहसें हमारे लोकतंत्र को कब नसीब होंगी?
  • आर्थिक मंदी खर्चने न दे, मुद्रास्फीति बचाने न दे
  • गांधी को सीमाओं में बंद किया ही नहीं जा सकता
  • विश्व राजनीति में भारतीय उभार की सुगबुगाहट
  • स्वार्थी नेता, ऊंघती पुलिस, आतंक के हवाले हिंदुस्तान
  • जो चीन ने देखा, वह नए भारत का आत्मविश्वास है
  • अमेरिकी वर्चस्व के अंत की शुरूआत हो रही है?
  • बंद को तो बीसवीं सदी में ही छोड़ आना चाहिए था
  • पाकिस्तान के धारावाहिक का अंतिम एपीसोड बाकी
  • पाकिस्तान, आज तुम खुश तो बहुत होगे!
  • घाटी के अधिनायकवाद को चुनौती दी है जम्मू ने
  • अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की मुख्यधारा में जाते हम
  • विश्वास मत तो जीत लिया किंतु क्या विश्वास भी?
  • कामरेडों ने पार्टी का प्रहसन बना डाला
  • अर्थशास्त्री पीएम क्या होता है, अब दिखाएं मनमोहन
  • अलविदा कामरेड, अब जरा बिजली को आने दो!
  • भारत तक आ पहुंचा चीनी साइबर युद्ध!
  • ब्लैकबेरी विवाद: मजबूती ही कैसे बन गई कमजोरी!
  • जिन्हें सरकारों ने छिपाया, उन्हें इंटरनेट ने दिखाया
  • तिब्बत से चिंतित चीन ने लगाए इंटरनेट पर ताले
  • याहू का अधिग्रहण हुआ तो सबसे बड़ा सौदा होगा
  • ब्लॉगिंग में भी पैसा है मगर 'ईजी मनी' नहीं